डॉ. निशंक ‘प्री’ में पास, ‘मेन्स’ है अभी बाकी

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निशंक की नयी चुनौतियां अब शुरू 

निशंक ने खुद के कौशल को साबित कर इतिहास में महत्वूपर्ण पन्ने पर किया अपना नाम दर्ज 

योगेश भट्ट 
कल्पना कीजिए कि जिस देश में सत्तर फीसदी से अधिक बच्चे 12 वीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाते, 36 फीसदी बच्चे माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाते, उस देश में 18 साल तक के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है।
तीन से छह साल के सभी बच्चे स्कूली शिक्षा में शामिल हैं, कक्षा तीन तक का हर बच्चा बुनियादी साक्षर है, उसे संख्यात्मक ज्ञान है। जहां आजादी के सत्तर साल बाद भी 20 फीसदी से अधिक बच्चों को प्रथामिक शिक्षा नहीं मिल पायी, वहां शत् प्रतिशत बच्चों को स्कूली शिक्षा मिल रही है।
शिक्षा में भाषा का कोई विवाद नहीं है, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान के लिए राष्ट्रीय मिशन चल रहा है, स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठयक्रम है, बच्चा जहां, जिस भारतीय भाषा में स्कूली शिक्षा लेना चाहता है, उसमें दी जा रही है।
जिस देश में करोड़ों बच्चों को गणित छकाती हो, अंग्रेजी रूलाती हो, जहां स्कूलों में सिर्फ ‘रट्टू तोते’ तैयार किये जाते हों, वहां व्यवहारिक एवं तार्किक ज्ञान दिया जा रहा है। वहां छात्रों पर न परीक्षाओं का भय है और न पाठ्यक्रम का दबाव।
परीक्षाएं भी व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर क्षमताओं के आकलन के लिए हो रही हैं, जिनमें बच्चों की याददाश्त को नहीं बल्कि उनके ज्ञान को परखा जा रहा है। छात्रों के रिपोर्ट कार्ड में मूल्यांकन उनके सहपाठी, अध्यापक और बच्चे खुद मिलकर कर रहे हैं।
जिस देश की शिक्षा रोटी और रोजगार की गारंटी न देती हो, वहां माध्यमिक शिक्षा में ‘कौशल विकास’ पाठयक्रम का हिस्सा है। स्कूल से छात्र शिक्षित ही नहीं ‘दक्ष’ होकर निकल रहे हैं। छात्रों की प्रगति के मूल्यांकन के लिए वहां ‘परख’ नाम का एक राष्ट्रीय आंकलन केंद्र है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित साफ्टवेयर से छात्र भविष्य से जुड़े निर्णय ले रहे हैं।
जहां बेहतर उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को भटकना पड़ता है। जरा सोचिए, वहां उच्च शिक्षा के मायने बदल चुके हैं। पचास फीसदी से अधिक बच्चे वैश्विक मानकों वाली उच्च शिक्षा ले रहे हैं।
नौकरी हासिल करने के लिए वहां बड़ी डिग्रियां जरूरी नहीं हैं। विदेशों की तरह वहां भी मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम तथा मल्टीपल डिसिप्लेनरी सिस्टम है। किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या के चलते या फिर किसी भी अन्य कारण से पढ़ाई छूट जाती है तो कोई चिंता नहीं।
मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम के तहत एक साल पढ़ाई करने पर सर्टिफिकेट, दो साल बाद डिप्लोमा और तीन या चार साल की पढ़ाई पर डिग्री मिलने लगी है। नौकरी में जाने वाले तीन साल का डिग्री कोर्स कर रहे हैं, जबकि रिसर्च और अध्यापन के क्षेत्र में जाने वाले चार साल का डिग्री कोर्स कर रहे हैं।
जहां एक विश्वविद्यालय दूसरे विवि की डिग्री पर सवाल उठाता हो, जहां दाखिले की प्रक्रिया से लेकर पाठयक्रम तक अलग हों, वहां हर विश्वविद्यालय के लिए शिक्षा के मानक समान हो चुके हैं।
ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कुछ और है और दिल्ली, बिहार, पंजाब में कुछ और। देश भर में केंद्रीय, राज्य और डीम्ड विवि में एकरूपता है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी हर कालेज और विश्वविद्यालय के लिए ‘एक’ प्रवेश परीक्षा करा रही है। इसी एक ही प्रवेश परीक्षा से छात्रों का इनमें प्रवेश हो रहा है। विश्वविद्यालयों की संख्या इतनी हो चुकी है कि दाखिले की मारामारी नहीं रह गयी है।
जहां से अनुसंधान और उच्च शिक्षा के लिए छात्र विदेशों का रुख करते हों, वहां आईआईटी और आईआईएम के समकक्ष वैश्विक मानकों के बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय खुल रहे हैं। इन संस्थानों में विज्ञान विषयों के साथ कला की भी पढ़ाई हो रही है।
इंजीनियरिंग करने वाला संगीत भी पढ़ रहा है, दुनिया के कई नामचीन विश्वविद्यालयों के कैंपस भी देश में ही खुलने लगे हैं, आए दिन नए नए शोध हो रहे हैं।अमेरिका की तरह यहां भी नेशनल रिसर्च फाउंडेशन है, राष्ट्रीय स्तर का यह फाउंडेशन विज्ञान के साथ ही आर्ट्स विषयों के रिसर्च प्रोजेक्टस को भी फंडिंग कर रहा है।
जहां शिक्षा में तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ मजबूरी होता रहा हो, वहां तकनीक के बेहतर इस्तेमाल, प्लानिंग औैर प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वायत्त फोरम, ‘एनईटीएफ’ चल रहा है। यह संस्थान वंचित समूहों तक शिक्षा पहुंचाने का काम कर रहा है। कला, विज्ञान और व्यवसायिक व शैक्षणिक विषयों में कोई भेद नहीं है।
पाठयक्रम और पाठ्येतर गतिविधियों में भी अंतर नहीं है। हर विषय महत्वपूर्ण हो गया है। यूजीसी, एनसीटीई और एआईसीटी जैसी संस्थाएं अब एक ही संस्था उच्च शिक्षा आयोग के अंतर्गत चल रही हैं।
जहां सरकारी शिक्षण संस्थान बदहाल हो चुके हों और शिक्षा पूरी तरह व्यवसाय बन चुकी है, वहां प्राइवेट कालेजों की फीस अब खुद सरकार तय कर रही है। जिस देश में पांच लाख शिक्षकों के पद खाली चल रहे हों, जहां शिक्षकों की भर्तियां चोर दरवाजे से होती हैं, वहां प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में शिक्षकों की नियुक्ति पारदर्शी व्यवस्था के तहत हो रही है। एडहॉक, शिक्षा मित्र और गेस्ट टीचर की व्यवस्था समाप्त हो चुकी है।
शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर दिया जा रहा है। बीएड और टीईटी का पैटर्न बदल चुका है। टीईटी पास करने वाले उम्मीदवारों के लिए स्थानीय भाषा का ज्ञान भी जरूरी है। अध्यापन के लिए न्यूनतम डिग्री योग्यता चार बरस की है। शिक्षकों की पदोन्नति उनके प्रदर्शन के आंकलन पर हो रही है। उनके लिए राष्ट्रीय व्यवसायिक मानक हैं, जिसमें शिक्षक की भूमिका भी तय है और लक्ष्य भी।
अध्यापक शिक्षा के लिए अलग से राष्ट्रीय पाठयचर्चा भी है। शिक्षा संस्थानों में अनुभव आधारित शिक्षण और तार्किक चिंतन पर जोर दिया जा रहा है। और सबसे बड़ी बात यह कि जिस देश में शिक्षा चुनावी मुददा न हो, जिस देश में शिक्षा पर सालाना खर्च वैश्विक औसत के बराबर भी न हो, वहां जीडीपी का सालाना छह फीसदी शिक्षा पर खर्च हो रहा है।
देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर यह वो सपना है तो नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानि ‘एनईपी 2020’ दिखाती है। देश में तकरीबन साढ़े तीन दशक बाद एक नयी शिक्षा नीति लागू होने जा रही है। कोई इसके संभावित खतरे गिना रहा है तो कोई खूबियां। शिक्षाविदों और राजनेताओं के रस्मी समर्थन और विरोध के बीच देश में नयी नीति लागू हो जाएगी। आशंका जताई जा रही है कि इस नीति से शिक्षा व्यवस्था महंगी हो जाएगी। निम्न वर्ग के लिए इसे चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है तो यह भी कहा जा रहा है शिक्षा का संस्कृतिकरण करने की कोशिश है।
मुददा एक बार फिर भटक रहा है, सवाल अब नीति के समर्थन या विरोध का तो रह ही नहीं गया है। नीति के कुछ प्राविधानों से असहमति हो सकती है, कुछ पर संशय भी किया जा सकता है मगर तमाम उन पहलुओं को नजर अंदाज भी नहीं किया जा सकता जो बेहतर कल का सपना दिखाते हैं। नीति कोई भी संपूर्ण नहीं होती, इसलिए असल सवाल तो उस कसौटी का है जिस पर नीति तैयार की गयी है।
क्या आज इस बात से इंकार किया जा सकता है कि देश को एक अदद शिक्षा नीति की दरकार है ? क्या इस पर कोई दोराय है कि देश की शिक्षा व्यवस्था वैश्विक मानकों वाली नवाचारी, गुणवत्तापरक, रोजगारपरक और अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरी करने वाली होनी चाहिए ? यदि नहीं तो फिर इस पर भी शायद ही असहमति हो कि मौजूदा व्यवस्था व्यवहारिक नहीं रह गयी है।
सच्चाई यह है कि दुनिया बदल रही है। प्राथमिकताएं, जरूरतें सब बदलती जा रही हैं। अर्थव्यवस्था ज्ञान आधारित होती जा रही है। ऐसे में हमारी शिक्षा व्यवस्था इस स्थिति में नहीं है कि हम उसके भरोसे आसन्न चुनौतियों का सामना कर सकें। अपने देश में डिग्री की कोई अहमियत नहीं है। स्नात्कोत्तर की डिग्री लिए युवाओं का चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए कतार में लगे होना सामान्य बात हो चुका है।
आरटीई और अनिवार्य प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा लागू होने के बावजूद हालात सुधरे नहीं हैं। नामांकन दर भले ही शत प्रतिशत के करीब हो गयी है, मगर हकीकत यह है कि आज भी 20 फीसदी बच्चे प्राथमिक और 36 फीसदी बच्चे माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाते।
सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में तकरीबन दस फीसदी आबादी 14 से 18 वर्ष के बच्चों की है। इनमें 47 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो अंग्रेजी के साधारण वाक्य भी नहीं पढ़ सकते। तकरीबन 27 फीसदी बच्चे बिना रुके हिंदी नहीं पढ़ सकते।
‘असर’ संस्था की रिपोर्ट के अनुसार तो आठवीं कक्षा के 56 फीसदी बच्चों को जोड़-घटाना जैसा गणित भी नहीं आता। उच्च शिक्षा के हाल भी छिपे नहीं हैं। दुनिया भर के शीर्ष सौ विश्वविद्यालयों में अपने देश के एक भी विश्वविद्यालय नहीं है।
होगा भी कैसे ? एक तो प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की कमजोर बुनियाद और उपर से ओछी सियासत। दोष दरअसल नीतियों का नहीं है, तंत्र का है, जहां नीतियां समय पर बनती ही नहीं हैं। बनती हैं तो लागू होने से पहले ही सियासत की भेंट चढ़ जाती हैं। और आखिरकार लागू होती भी हैं तो उन पर समय रहते अमल ही नहीं हो पाता।
जहां तक शिक्षा व्यवस्था का सवाल है तो आदर्श तौर पर हर बीस साल में शिक्षा नीति का मूल्यांकन कर उसमें जरूरी व्यवहारिक बदलाव होने चाहिए। मगर अपने यहां मूल्यांकन तो छोड़िये सालों साल सिर्फ प्रस्ताव तैयार होने में ही निकल जाते हैं।
नई शिक्षा नीति के बारे में सुनते हुए ही सालों साल बीत चुके हैं, अब जाकर नयी नीति लागू होने जा रही है, दावा है कि इसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी परामर्श प्रक्रिया अपनायी गयी। बहरहाल यहां सवाल प्रक्रिया का नहीं बल्कि उन सपनों का है जो नयी शिक्षा नीति में दिखाए गए हैं।
दरअसल कोई भी नीति अपने आप में संपूर्ण नहीं होती, न ही बुरी होती है। सवाल हर नीति पर होते हैं तो बदलाव और सुधार की गुंजाइश भी उनमें हमेशा रहती है। देश की शिक्षा नीति के इतिहास पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि ख्वाब तो यहां हमेशा से सुनहरे दिखाए जाते रहे हैं। यह बात अलग ही ख्वाब ‘ख्वाब’ ही रहे, ‘हकीकत’ नहीं बन पाए।
देखिए, वर्ष 1968 में तो शिक्षा को राष्ट्रीय महत्व का विषय घोषित किया गया था। उस वक्त भी 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा की बात की गयी, शिक्षकों के बेहतर प्रशिक्षण और योग्यता की जरूरत पर बल दिया गया। उस वक्त शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसदी खर्च किये जाने का राष्ट्रीय लक्ष्य रखा गया। संस्कृत भाषा के शिक्षण को प्रोत्साहित किए जाने की खूब बातें हुईं।
साल 1986 में तो प्राथमिक स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए ‘आपरेशन ब्लैक बोर्ड’ भी लांच हुआ। ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर पर सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए गांधी दर्शन पर आधारित मॉडल ‘ग्रामीण विश्वविद्यालय’ स्थापित करने की सिफारिश हुई। दुर्भाग्य देखिए कि आज आजाद भारत की तीसरी शिक्षा नीति में भी हम वहीं खड़े हैं।
यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि नयी शिक्षा नीति में भी जीडीपी के छह फीसदी खर्च की बात की जा रही है। आज की बात नहीं है, एक जमाने से सुनते आ रहे हैं कि देश की जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा के मद में खर्च होना चाहिए।
मगर नाकामी की दास्तां काफी लंबी है। पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में इसे राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया गया तो दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में भी यही दोहराया गया। और वास्तविकता यह है कि बीते पांच वर्षों में जीडीपी का औसत तीन फीसदी भी खर्च नहीं हुआ।
देश के नीति आयोग ने हालिया रिपोर्ट ‘स्ट्रेटेजी फॉर न्यू इंडिया 75’ में कहा है कि वर्ष 2022 तक भारत सरकार को शिक्षा खर्च वर्तमान से दोगुना करते हुए जीडीपी का कम से कम छह फीसदी सुनिश्चित करना चाहिए।
नयी शिक्षा नीति के सामने भी सपनों को पूरा कराने की चुनौती है। नीति को कागजों से बाहर निकाल कर व्यहारिक धरातल पर उतारना एक बड़ी चुनौती है। काम इतना आसान नहीं है मगर जिस तरह राज्य नयी शिक्षा नीति को लेकर उत्साह दिखा रहे हैं, उससे उम्मीद बंधती है। निसंदेह नीति के तमाम प्राविधान सुधारात्मक हैं, मगर राज्य और तमाम दूसरे महकमों के साथ समन्वय बैठाना भी उतना ही कठिन है।
जहां तक श्रेय का सवाल है तो विवादों में घिरी नयी शिक्षा नीति को निर्विवाद रूप से सरकार की मंजूरी दिलाने श्रेय मानव संसाधन विकास मंत्री (नई नीति के मुताबिक केंद्रीय शिक्षा मंत्री) रमेश पोखरियाल निशंक के खाते में जाता है।
निसंदेह निशंक ने खुद के कौशल को साबित कर इतिहास में महत्वूपर्ण पन्ने पर नाम दर्ज किया है, मगर सच्चाई यह भी है कि निशंक की नयी चुनौतियां यहां से शुरू होती हैं । यूं मानिए कि निशंक ‘प्री’ परीक्षा में पास हुए है और अभी ‘मेन्स’ यानि मुख्य परीक्षा बाकी है।

(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं )