डॉ. हरक सिंह रावत की घोषणा में कितना दम, अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे हम

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चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा में चुनाव लड़ने की नज़र आ रही गुंजाईश!

राजेन्द्र जोशी
देहरादून : कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की इस घोषणा कि वे अब अगला विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे में कितना दम राजनीतिक विश्लेषकों को नज़र आता है वे कह नहीं सकते लेकिन उनकी इस चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा में कहीं न कहीं चुनाव लड़ने की गुंजाईश नज़र आ रही है। अब यह तय नहीं है की वे भाजपा से ही चुनाव लड़ेंगे या और किसी दल से यह अभी भविष्य के गर्भ में हैं क्योंकि सूबे में विधानसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं। 
गौरतलब हो कि इससे पहले डॉ. हरक सिंह रावत ने वर्ष 2012 की 19 मार्च को सिद्ध पीठ मां धारी देवी के मंदिर में कभी मंत्री न बनने की कसम खाई थी, हालांकि उस दौरान डॉ. हरक सिंह रावत के इस बयान को मुख्यमंत्री पद के लिए दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा गया था। लेकिन बाद में वे विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जब उन्होंने भी मंत्री पद की शपथ ली तो सूबे के लोगों को यह बात नागवार गुजरी कि डॉ. हरक सिंह रावत को ऐसी कसम नहीं खानी चाहिए थी वह भी धारी देवी का नाम लेकर। हालांकि बाद में धारी देवी पुजारी न्यास के पदाधिकारियों ने यह कहा कि डॉ. रावत ने धारी देवी मंदिर में ऐसा कोई संकल्प नहीं लिया था, और यह बात आई गई हो गई। 
अब वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र दौड़ते हैं डॉ. हरक सिंह रावत को अभी सूबे के कर्मकार कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद यह घटनाक्रम सामने आया है कि डॉ. रावत अब चुनाव नहीं लड़ेंगे। डॉ. रावत को बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद उनकी जगह सत्याल को बोर्ड के अध्यक्ष का दायित्व दिया गया है। इसके बाद ही डॉ. हरक सिंह रावत का यह बयान आया है कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगे, के कई राजनीतिक निहितार्थ निकले जा रहे हैं।  क्योंकि आगामी वर्ष में उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस से भाजपा में आए और भाजपा द्वारा मंत्री बनाए गए नेताओं में से अधिकाँश को अब यह भरोसा नहीं यही कि भाजपा उनको आगे चुनाव लड़ने के लिए भेजेगी,अथवा नहीं लिहाज़ा वे अभी से अपना चुनावी मैदान तराशने और तलाशने में जुट गए हैं। वहीं भाजपा के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं से कोई भाजपा का कोई ऐसा समझौता नहीं था कि उन्हें आगे भी टिकट या मंत्रिपद दिया जायेगा।  
वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए नेताओं को भाजपा की कार्यसंस्कृति रास नहीं आ रही है  जबकि उनके मंसूबे काफी बड़े थे। वहीँ केंद्र में जहाँ प्रधानमंत्री मोदी के इस एलान पर न खुद खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा को अंगीकार करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी प्रधानमंत्री की तर्ज पर उत्तराखंड में बीते इन साढ़े तीन सालों में पारदर्शी सरकार देने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उन्होंने देश में प्रदेश की बीते समय की धूमिल तस्वीर को साफ़ करने की पूरी कोशिश की है। यही कारण है कि कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए विधायकों और मंत्रियों को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र की पारदर्शी कार्यशैली हज़म नहीं हो पा रही है और गाहे -बगाहे कई बार अपनी ही सरकार को गरियाते रहे हैं। जबकि भाजपा की कार्यसंस्कृति में रचे -बसे भाजपा के पुराने कार्यकर्ता, विधायक और मंत्रियों को कभी मुख्यमंत्री की कार्यशैली से कोई दिक्कत नहीं हुई।