अखिलेश डिमरी 

भक्तजनों ! यूँ तो पुनर्जन्म की कथाओं पर अधिकतर पाठक विश्वाश नहीं करते पर ये कथाएं दंत कथाओं की भाँति स्मरण में होती हैं, जिन्हें चर्चा चौपालों में किस्से कहानियाँ कहा करते हैं। इन कथाओं में से कुछ सत्य होती हैं तो कुछ सत्य के करीब।

तो भक्तजनों! आज एक ऐसी ही कथा आपको सुनाने जा रहा हूँ जो सत्य के करीब है और इस कथा की विशेषता यह है कि इस कथा का आप सभी सुधी पाठक और श्रोता भूत भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में श्रवण कर महिमागान कर सकते हैं, और कथा की सत्यता का आंकलन पाठक भविष्य में भी किया जा सकता हैं।

एक बार की बात है आर्यावर्त में केदारखंड के एक प्रांत की सत्ता के चौदहवें नवयौवन काल में महाप्रतापी राजा नें प्रांत की सत्ता को सम्भाला और संभालने के साथ ही चतुर व्यापारियों और खुद के खजाने के लिए समुद्रमंथन में प्राप्त पेय सोमरस का नया अवतार “डेनिस” प्रजा के अधरपान हेतु प्रस्तुत किया। इस सोमरस के दो घूँट मात्र से ही प्रजा मदमस्त होने लगी।

धीरे धीरे यह पेय, प्रांत के सभी मयखानों में अपनी नीलिमां बिखेरने लगा , महाप्रतापी राजा प्रसन्न था उसका खजाना भर रहा था , लेकिन कुछ समय बीतने के बाद इस पेय की वजह से महाप्रतापी राजा की ही छी छी होने लगी , प्रजा नें चुनाव कर किसी और को ही राजा बनाने का निर्णय लिया और चुनाव सम्पन्न होने पर उस राजा की जगह नए राजा का राजतिलक हो गया।नया राजा उसी वर्ग का प्रतिनिधि था जिसने अपने से पूर्व महाप्रतापी राजा के समय और मुद्दों के साथ इस पेय डेनिस का भी विरोध किया था ।

प्रजा खुश थी कि चलो अब नए राजा के आने से अच्छी कोटि का सोमरस पीने को मिलेगा , बाकायदा राजा ने इस इसके लिए अपने शाशन में एक मंत्री की भी नियुक्ति की, सोमरस की सुलभता और प्रचार प्रसार के लिए सत्ता संभालते ही सबसे पहले राजाज्ञा निकाल कर राज मार्गों को जिला मार्ग घोषित किया ताकि इसकी बिक्री में कोई कानूनी बाधा न आये। हालांकि प्रजा में विरोध भी था किन्तु राजा और नियुक्त मंत्री द्वारा अंगरेजी के साथ साथ देशी उत्पाद को भी बढ़ावा दिया गया , पर्वत पर्वत कम दामों में देशी सोमरस की बिक्री की जाने का निर्णय लिया गया । ये अलग बात थी कि उस समय समाचार पत्रों के कलमकारों नें इसका विरोध किया लेकिन राजा और मंत्री ने किसी की न सुनी प्रांत के राजस्व वृद्धि के लिए इसे जरूरी कदम बताते हुए इसे लागू किया गया।

फिर समय आगे बढ़ता गया एक दिन पूर्व राजा के समय के एक चतुर नोकरशाह जो आवाम में तो बदनाम था किन्तु जिसे व्यापारियों और राजसत्ता के बीच में मध्यस्थता कराने में महारथ हासिल थी नें किसी स्थान विशेष के राजप्रसाद की कक्ष संख्या 104 में फिर से महाप्रतापी राजा के समय के सोमरस “डेनिस” को प्रांत में लागू करने की योजना को अमली जामा पहनाने की तैयारी की, इसमें उसका साथ उसी राजप्रासाद में ठहरे और पूर्वमहाप्रतापी राजा के समय के एक प्रमुख व्यक्ति ने भी दिया।

तय समय पर डेनिस के खरे व्यापारी को सूमो पहलवान की तरह एक सुर्ख स्याह व्यक्ति राजप्रासाद के निर्धारित कक्ष में लेकर आया , कक्ष संख्या 107, 103 व् 106 से भी निर्धारित व्यक्तियों ने भी व्यापारी, मध्यस्थ चतुर नोकरशाह और वर्तमान सत्ता के एक प्रमुख व्यक्तियों के साथ इस बैठक में शिरकत की । उम्मीद है कि माह के अंत के बाद डेनिस फिर से प्रांत के मयखानों में अपनी नीलिमा बनाने लगेगी।

डेनिस के पुनर्जन्म की अग्रिम शुभकामनाएं।

वंदेमातरम्।

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