• सरकार के जीरो टॉलरेंस पर अडिग होने की परीक्षा का समय !
  • गिरोहबंदी कर रहे आईएएस अधिकारियों पर भारी पड़ सकती है सरकार !
  • क्या चंद भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिये आगे आएगा आईएएस एसोसिएशन!

राजेन्द्र जोशी 

DEHRADUN : अस्थायी राजधानी देहरादून में बीते दिन की घटना ने जहाँ राज्यवासियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या चंद दागी अधिकारियों के दबाव में राज्य सरकार झुकेगी या प्रदेश सरकार सूबे के दागी अधिकारियों के खिलाफ और भी सख्त कदम उठाकर अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति पर कायम रहते हुए भ्रष्टाचार की आंच में झुलस रहे आईएएस अधिकारियों की जांच को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्पित होने का सन्देश देश सहित प्रदेश की जनता तक पहुंचाएगी ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी सूबे में भ्रष्टाचारपूर्ण आचरण करने से पहले कई बार यह सोचने को मजबूर हो कि त्रिवेंद्र सरकार के दौरान उसने किसी भी भ्रष्टाचारी को नहीं बख्शा। 

राज्य की राजधानी का यह शायद पहला अवसर होगा जब लगभग  40 आईएएस अधिकारियों ने अपने ही बीच के चंद अधिकारियों के भ्रष्टाचार के मामले में फंस जाने के बाद राज्य सरकार पर दबाव की नीति के तहत अपर मुख्य सचिव कार्मिक राधा रतूड़ी और मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश से मुलाकात की। इस मुलाकात में आईएएस अफसरों ने चंद अधिकारियों के एनएच -74 और एमडीडीए के स्पेशल ऑडिट मामले में की जा रही जांच को लेकर आक्रोश भी जताया। इतना ही इन्होने मुख्यमंत्री से मिलने के लिए समय भी मांगा है। एक जानकारी के अनुसार एसोसिएशन की ओर से यह भी कहा गया है कि ऑर्बिट्रेशन न्यायिक अधिकारों के तहत की जाने वाली प्रक्रिया है। यदि ऑर्बिट्रेटर किसी मामले में निर्णय देता है, तो उसकी अपील जिला जज की कोर्ट में किए जाने की व्यवस्था है। इसकी जांच किए जाने को उन्होंने गलत ठहराया गया है। वहीँ इसके अलावा एमडीडीए की ओर से दो साल के रुटीन ऑडिट के पत्र पर पांच साल का स्पेशल ऑडिट कराए जाने के फैसले पर भी आईएएस अधिकारियों ने सवाल खड़े किए  हैं ।

मामले में आईएएस एसोसिएशन के इस तरह के व्यवहार की राज्यवासियों में खासी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।  एनएच -74 मामले के खुलासे से पहले सोशल मीडिया पर भाजपा सरकार को बुरी तरह से गरियाने वाले लोग मुआवजा घोटाले की जांच के सही दिशा में चलने और राज्य सरकार का जांच को लेकर कड़े रुख के बाद सोशल मीडिया पर भाजपा विरोधी भी मुख्यमंत्री सहित सरकार की तारीफ़ करने लगे हैं कि कम से कम राज्य के अस्तित्व में आने के 18 साल बाद ही सही कोई जांच तो मुकाम तक पहुँच रही है और सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चलाकर भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे डालती नज़र आ रही है। 

मामले को लेकर राज्य की ब्यूरोक्रेसी के रुख के बाद अब गेंद राज्य सरकार के पाले में जाती हुई नज़र आ रही है।  मामले में यदि राज्य सरकार चंद आईएएस अधिकारियों के दबाव में अब अपने कदम पीछे खींचती है तो यह तय है कि इससे प्रदेश में डबल इंजन की सरकार की जो छिछालेदारी सोशल मीडिया और तमाम मंचों पर होगी इसको कोई बचा नहीं सकेगा। वहीं विपक्ष को भी बैठे -बिठाये सरकार को कठघरे में खड़ा करने का मौक़ा भी मिल आएगा कि सरकार का भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का नारा केवल छोटे अधिकारियों के लिए है, मामले में जब बड़े मगरमच्छ पकड़ में आये तो सरकार ने जांच से हाथ खींच लिया। इसके बाद सरकार के पास बीच बचाव का कोई रास्ता भी नहीं बचेगा और वह जनता के बीच भ्रष्टाचार पर बेनकाब हो जायेगी।

वहीँ राजनीतिक जानकारों का साफ़ -साफ़ कहना है कि आईएएस अधिकारियों की यह रणनीति राज्य सरकार पर दबाव की नीति बनाकर चंद भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों को बचाने और सरकार पर दबाव की मुहीम के रूप में देखी जा रही है। जानकारों का तो यहाँ तक कहना है यहाँ आईएएस अधिकारी दिल्ली सरकार की तर्ज पर केजरीवाल पर दबाव बनाने वाली नीति  पर नज़र आ रहे हैं। इनका कहना है शायद यहाँ तैनात आईएएस अधिकारी यह भूल रहे हैं कि  दिल्ली में आईएएस अधिकारियों के पीछे किसी के समर्थन वाला हाथ था. जो उन्हें यहाँ नहीं मिलेगा और इन अधिकारियों को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि यहाँ वे पूर्णतः राज्य सरकार के अधीन कार्यरत हैं यदि उन्होंने  राज्य सरकार  आदेशों की अवहेलना की अथवा अनुशासनहीनता की तो राज्य केंद्र से  इनके स्थान पर अन्य आईएएस अधिकारियों की मांग कर सकता है। ऐसे में साफ़ है कि कम से काम अब उत्तराखंड में इस तरह से सरकार पर दबाव की नीति का असर नहीं होने वाला। वहीँ राज्य के मुख्यमंत्री की कड़क और ईमानदार वाली छवि भी गिरोहबंदी कर रहे आईएएस अधिकारियों पर भारी पड़ सकती है।