उत्तराखंड का वैदिक सनातन धर्म मे योगदान

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  • उत्तराखंड की विभिन्न क्षेत्रो मे अनेकों संस्थाए हैं संघर्षरत
  • 1 जनवरी को हैप्पी न्यूइयर मनाते हैं। नव संवत्सर का ज्ञान किसी को नहीं !

सी एम पपनैं

नई दिल्ली। उत्तरांचल विद्वत परिषद दिल्ली द्वारा गढ़वाल भवन झंडेवालान के सभागार मे भारतीय संवत्सर विक्रम संवत 2076 के आगमन पर संपूर्ण राष्ट्र के लिए मंगलमय कामना की चाहत हेतु भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।ज्योतिषाचार्य पं. महिमानंद द्विवेदी की अध्यक्षता मे कार्यक्रम संयोजक रमेश चंद्र घिंडियाल व संस्था के महासचिव पवन मैठानी ने सभागार मे उपस्थित प्रबुद्ध जनो का विक्रम संवत 2076 के महत्व व आयोजन के उद्देश्य पर बृहद प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली प्रवास मे उत्तराखंड की विभिन्न क्षेत्रो मे अनेकों संस्थाए संघर्षरत हैं। अंचल के ख्याति प्राप्त प्रवासी विद्वानो को एक साझा मंच देने के उद्देश्य से पं0 महिमानंद द्विवेदी की अध्यक्षता मे ‘उत्तराखंड विद्वत परिषद’ का गठन सन 2015 मे समाज व मानव कल्याण के उत्थान व स्मृद्धि की पावन भावना के साथ किया गया।

अवगत कराया गया, भारत की सांस्कृतिक व सनातन परंपरा को समयावधि मे नही बाध सकते। संस्कृति की पावन धारा निरंतर बहती जा रही है। भारतीय संस्कृति सभ्यता को आगे बढ़ाना है। कहा गया, प्रतिवर्ष हम 1 जनवरी को हैप्पी न्यूइयर मनाते हैं। नव संवत्सर का ज्ञान किसी को नही है। हिंदू नववर्ष को उत्तराखंडी भी नही मनाते हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।आयोजित कार्यक्रम पं0 महिमानंद द्विवेदी की चाहत पर सनातन धर्म के उत्थान हेतु 2015 से प्रतिवर्ष आयोजित किया जा रहा है। एक सप्ताह तक यह कार्यक्रम मनाया जाता है।

विद्वानों के मतानुसार वेद पाठो के प्रवचन का यह उत्तम समय माना जाता है।अंचल के प्रबुद्ध प्रवासी जनो से खचाखच भरे सभागार मे मंचासीन डॉ हेमा उनियाल, मीरा गैरोला, पुरन चंद्र कांडपाल, डॉ सत्येन्द्र प्रयासी, मंगत राम धस्माना, चंद्र मोहन पपनैं, चंद्र बल्लभ बुडाकोटी, डॉ जीत राम भट्ट, डॉ कुसुम नोटियाल, मोहब्बत सिंह राणा, बृजमोहन उप्रेती ने पंडित महिमानंद द्विवेदी की अध्यक्षता व 11 विद्वान आचार्यो द्वारा किए गये मंगला चरण वेद पाठो की गूंज मे दीप प्रज्वलित किया।मीरा गैरोला के

संस्कृत श्लोक व मंगलगान-
मुक्त कुंडे…..हे शारदे माँ….हम हैं अधूरे….तेरी शरण हमे तार दे माँ…

के लय बद्ध व मधुर गायन के साथ नव संवत्सर कार्यक्रम मे वक्ताओं के संबोधन व गढ़वाली-कुंमाऊनी बोली-भाषा कवि सम्मेलन का श्री गणेश हुआ।

अध्यक्षीय संबोधन मे पं. महिमानंद द्विवेदी ने सनातन धर्म की पराकाष्ठा हेतु दैविक शक्तियों के आभार के साथ-साथ सभागार मे मौजूद सभी वैदिक आचार्यो व श्रोताओं का आभार व्यक्त किया, सनातन धर्म की मर्यादा व परंपरा को कायम रखने के लिए। उन्होंने कहा देश के भू-भाग हिमालयी क्षेत्र कश्मीर से कन्याकुमारी तक सनातन उपासना होती रही है, होती रहेगी। समाज मे प्रभुता की कमी है। अंग्रेजी नववर्ष हमारा नववर्ष नही, हमारी पराधीनता वर्ष है। हमारा नववर्ष 6 अप्रेल को आरम्भ होता है। चैत्र शुक्ल पक्ष को। हम सनातनी हैं। घर-घर मे साकार मूर्तियां रखी हैं। अंग्रेजो के हिसाब से हमारे सनातन मे शनिवार को छुट्टी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा भगवान् ने कहा है, चारो वर्ण मैंने बनाए हैं। सभी ब्रह्मा की संतान हैं। हमारे पैर शूद्र हैं, पैरों मे प्रणाम करते हैं। इसी प्रकार उन्होंने अन्य वर्णो की महत्ता का भी सारगर्भित वर्णन किया व महत्व बताया। उन्होंने कहा वर्ष मे एक कार्य नववर्ष का होगा, विश्व के लिए, देश के लिए, मानव समाज के लिए।

डॉ. मधुकर द्विवेदी ने अपने संबोधन मे अवगत कराया की वे 2015 से क्रमिक रुप से इस आयोजन मे भाग ले रहे हैं। उन्होंने अवगत कराया पिछले विक्रम संवत मे सूर्य पिता व पुत्र शनि थे। अब नए संवत मे पहले शनि व फिर सूर्य हैं। आने वाला समय युवा शक्ति का आ रहा है, जो अव्वल रहेगा। उन्होंने सवंत्सर का मतलब भी बताया। अवगत कराया सवंत्सर मे ऋतुओं व दिनों इत्यादि का परिवर्तन होता है। वैदिक युग को समझने के लिए चार चीजो को समझना जरूरी है- चांद मास, सौर मास, सावन मास व अधमास।मंचासीन वक्ताओं के संबोधन से पूर्व दो पुस्तको का लोकार्पण भी किया गया-
1- लेखक डॉ विहारी लाल जलंधरी रचित पुस्तक ‘उत्तराखंड की भाषा के ध्वनि आखर’ (गढ़वाली कुंमाउनी पर केंद्रित) 
2- मंगत राम धस्माना रचित ‘उत्तराखंड के सिद्धपीठ’।

मंचासीन वक्ताओं ने अपने संबोधन मे सभागार मे बैठै श्रोताओं को नवसंवत्सर की शुभ कामनाऐ दी। अवगत कराया की सनातन धर्म मे गढ़वाल का ज्योतिष व कुमाऊँ का कर्मकांड विश्व विख्यात है। देश के अनेक राज नरेशो के ज्योतिषाचार्य उत्तराखंड के रहे हैं, जो गर्व की बात रही है। उत्तराखंड की लोकपरम्पराओ की तरह ज्योतिष भी एक मानी-जानी परंपरा रही है। उत्तराखंड ने पूरे विश्व का मार्ग दर्शन किया है।वर्तमान मे हमारे आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम 15 वी व 16वी शताब्दी के बाद के मंचित होते दिखाई देते हैं। वेदों की रचनाऐं, उपनिषद उत्तराखंड मे रचे गए हैं। 18 पुराणों का महत्व है। तप ऋषिमुनियों ने उत्तराखंड मे किया है, पूरे विश्व को मार्गदर्शन मिला है। ज्योतिष का चिंतन उत्तराखंड की धरा पर हुआ है।वक्ताओं ने कामना की कि भारतीय शास्त्र जो नया लिखा जाना है, उत्तराखंड से ही हो। किताबो के बल स्थानीय बोली-भाषा को समृद्ध किया जाए, इसी से सपना साकर होगा। हमारे आयोजित किए जा रहे कार्यकर्मो का महत्व जगजाहिर हो। यह सब मील का पत्थर साबित हो सकता है। वक्ताओं ने सामाजिक व सांस्कृतिक परिपाठियो व सनातन धर्म क्या है, पर सारगर्भित प्रकाश डाला।संबोधन मे वक्ताओं ने कहा कि स्त्री के बिना संवत्सर नही। धरती स्त्री का ही रूप है। 40-42 सवंत्सर हैं।1 वर्ष मे सूर्य 12 राशियों का योग देता है। तारीख भी संवत्सर का ही अंग है। सारी बाते सूर्य पर आधारित हैं। समस्त जीवो की आत्मा सूर्य है। सभी धर्म रविवार की छुट्टी रखते हैं। दो ही जाति हैं दैव व असुर। दुनिया मे जब सवाल उठते हैं तब सत्य व असत्य का पता चलता है।जाति व वर्ण को क्यों बाटा गया है? वेदों का अनुवाद अन्य भाषाओं मे होने के बाद विश्व के देशों को भारत की महत्ता व ज्ञान का पता चला।

वक्ताओं ने कहा, वेदों को समझ कर मनुष्य भेद करना भूल जायेगा। देश की सारस्वत परंपरा बनी रहे।आचार्य श्रीधर प्रसाद बलूनी, मदन मोहन जोशी, आचार्य रवींद्र जखोला ने भी नव संवत्सर पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे।वक्ताओं ने अपने वक्तव्य मे कहा, आज आधुनिक कम्प्यूटर व ज्योतिष मे .5 का फर्क आ गया है क्यों? सभी वक्ताओं की चाहत रही कि प्रतिवर्ष नव संवत्सर धूमधाम से मने। भारत के साथ-साथ विश्व मे शान्ति जरूरी है।

कुंमाउनी गढ़वाली बोली-भाषा कवि सम्मेलन मे जयपाल सिंह रावत ने – महिमा गुरु जी यू…दिन रात चलते रहे…बिन बुलाए कई मेहमान आते रहे… आज नव वर्ष की खुशियों मे कहा आप भी गीत गाते रहे… आप भी आइए पुण्य का कर्म है…विश्व मे शान्ति के गीत गाते रहे…।

दिनेश ध्यानी- होली का दिन ऐल बसन्ती फूल खिलंछन….बुरांश खिलंच्छ बसन्ती…गाड़ बगन्छ बसन्ती…

गिरीश ‘भावुक’ – टच मोबाइल ….कैक पास टैम नि छू एक दूसरा लीजी…होई गुजी, दिवाई मीठे…. त्यार सहार यूं दुःख बता रई…।

पूरन चन्द्र कांडपाल- पुरानी बदलती परंपराओं के बदले रुख पर वक्तव्य के बाद सटीक कविता-
पैस बनाडा लीजी है रे मारा मारी …..बखत निगुर हैगो …उनुहै एक बात कोण चानू मे….. पैस कारण अपण दीन ईमान बैचण फ़े गई …
एक अनम इज बाज्यू भै बैणी खरीद ल्याओ…आशीर्वाद दुआ पैसम नि मिलूंन….देश प्रेम….खोज लिया बाजार मे सुख संतोष नि मिलूंन…पैस सब कुछ नि छू।

विजय लक्ष्मी कपड़वाल-….आज मांग है दृष्टिकोणं मे…और गुरु लगे पढ़ाने मे…और नींव बना दी हमने इस नरंकुश समाज की….नव संवत्सर की इस मधुर बेला मे नए संसार जगाएंगे…

हरीश चंद्र बिष्ट ‘हंसमुख’-….डना-डना डाई बोटी चुपचाप हैरई ….. आल पहाड़ म्यर….दुर्गत है गई …अंजान परदेशी यथा बसे हैली….पीड़ को देखोंनो ….बानर सूअर खेती बाजी हैगए…आज पहाड़ म्यर….

अन्य कवियों डॉ सतीश कालेश्वरी, प्रदीप रावत, बृज मोहन शर्मा, गिरधारी लाल शर्मा, ललित केसवानी, विहारी लाल जलन्धर ने भी अपनी कुंमाउनी-गढ़वाली बोली-भाषा की सटीक हास्य, विपदा व गम्भीरता भरी कविताऐं सुना श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर वाह-वाही लूटी।मीरा गैरोला के प्रभावशाली मधुर बसंत गीत के गायन के साथ ही कार्यक्रम के समापन की घोषणा कार्यक्रम के प्रखर संचालक व संस्था के महासचिव पवन मैठाणी ने की।

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