”ऐली बेटा ……मेरी पौड़ी उखी देखलू”

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  • गढ़वाल कमिश्नरी की 50 वी वर्ष गाँठ पर…….

  • स्वर्णिम इतिहास रहा है गढ़वाल कमिश्नरी पौड़ी का

  • राज्य बनने के बाद अपने ही पहाड़ी प्रदेश में उपेक्षित हो गई गढ़वाल कमिश्नरी

  • पहाड़ी जिलों की पीड़ा और वेदना का इस शहर से 32 साल तक समझा

”ऐली बेटा मेरी पौड़ी…… उखी देखलू” यह गढ़वाली कहावत पौड़ी के लिए उस दौरान की है जब पौड़ी शहर अपनी रवानी पर था गढ़वाल के हर व्यक्ति को किसी न किसी काम से कभी न कभी पौड़ी आना होता था, वैसे तो यह बात किसी को ”चुनौती” के रूप में प्रसिद्ध थी लेकिन इसके पीछे के भाव आज भी साफ़ झलकते हैं कि तत्कालीन पौड़ी कितनी समृद्ध थी। लेकिन आज उस पौड़ी कमिश्नरी के 50 साल हम ऐसे मना रहे हैं जैसे हमने ही पौड़ी को अपने हाथों बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। यदि यहाँ जिला मुख्यालय न होता तो पौड़ी का वह स्वरूप आज जो  दिखाई दे रहा है वह और भी बदतर होता।यह वह पौड़ी है जिसने हेमवती नन्दनं बहुगुणा से लेकर भुवन चन्द्र खंडूरी, डॉ.रमेश पोखरियाल ‘निशंक” विजय बहुगुणा और वर्तमान में  त्रिवेन्द्र सिंह रावत जैसे मुख्यमंत्री इस प्रदेश को दिए हैं और प्रधानमंत्री मोदी के पसंदीदा व्यक्तित्वों में वर्तमान में पौड़ी जिले के अजीत डोभाल, बिपिन रावत सहित सहित कई ऐसे लोग है जो आज देश के क्षितिज पर चमक रहे हैं। लेकिन फिर भी क्या बात है कि वह पौड़ी आज अपने उसी स्वर्णिम भविष्य के लिए छटपटा रही है।  

  आज सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या गढ़वाल कमिश्नरी पौड़ी जो कभी चहलपहल और अपने 50 साल का सफर पूरा कर रही है उसे इस अधेड़ावस्था में किसने मार डाला ? क्या हम लोग इसके मरते हुए देखने का जश्न मना रहे हैं या एक बार इस कमिश्नरी को पुनर्जीवित करने हिम्मत कर सकते हैं ताकि पौड़ी के उस स्वरूप को वापस लौटाया जा सके और गढ़वाल की जनता में देहरादून के बजाय पौड़ी में ही न्याय की उम्मीद जगायी जा सके जैसे उसे राज्य के अस्तित्व में आने से पहले हुआ करती थी या फिर 50 साल पूरे होने के जश्न के बाद पौड़ी को एक बार फिर उसके हाल पर छोड़ देने का जश्न मना रहे हैं।

 

गढ़वाल कमिश्नरी पर तीन दिन से चल रहे भव्य कार्यक्रम आयोजित कर गढ़वाल कमिश्नरी की स्वर्ण जयंती मनाकर इस पल को यादगार बनाने के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रीमंडल इस भव्य कार्यक्रम का हिस्सा बनकर कार्यक्रम में शिरकत करेगा जिसकी तैयारियां भी शुरू हो गई है आखिर कैसा रहा गढ़वाल कमिश्नरी के 50 सालो का सफर ये सब आपको इस रिपोर्ट के जरिये दिखाते हैं।

पौड़ी से वरिष्ठ पत्रकार अनिल बहुगुणा की यह ख़ास रिपोर्ट ……..

एक जनवरी 1969 यानी वह दिन जब गढ़वाल क्षेत्र की जनता का वो सपना सच हो गया जिसकी परिकल्पना सालो से गढ़वाल क्षेत्र की जनता कर रही थी। 130 सालों तक कुमाऊ कमिश्नरी का हिस्सा रहे गढ़वाल क्षेत्र को 1 जनवरी 1969 में अविभाजित उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. बी. गोपाला रेड्डी ने गढ़वाल कमिश्नरी का दर्जा दे दिया जिसकी स्थापना पौड़ी में हुई ये दौर उस वक्त उत्तरप्रदेश और देश के लिए भी काफी गौरवशाली था। क्योंकि 60 से मण्डलीय कार्यालय भी पौड़ी में अपनी सेवा देने को तैयार थे। इन कार्यालयों में अधिकारी व कर्मचारियों की रौनक से पौड़ी चकाचौंध थी। इस दौरान पौड़ी के रुतबे से लेकर पौड़ी की संस्कृति उत्तरप्रदेश से लेकर देश विदेश तक भी अपनी अमिट छाप छोड़ रही थी। उस वक्त गढ़वाल उत्तरप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। गढ़वाल कमिश्नरी की स्थापना होने पर 4 जिले ही गढ़वाल कमिश्नरी के अधीन आये इनमें पौड़ी, चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी ही उस वक्त कमिश्नरी में शामिल हुए जबकि 1975 में सहारनपुर से काट कर देहरादून जिला गढ़वाल मंडल में शामिल हुआ इसके साथ ही 1977 में चमोली से अलग होकर रुद्रप्रयाग जिला भी गढ़वाल मंडल में शामिल हो गया।

गढ़वाल कमिश्नरी की स्थापना के बाद वर्ष 1994 में पृथक राज्य उत्तरांचल/उत्तराखंड की मांग को लेकर राज्य आंदोलनकारियों ने गढ़वाल कमिश्नरी से ही राज्य आंदोलन की शुरुआत की थी। यहां से राज्य आंदोलनकारी दिल्ली के लिए रवाना हुए लेकिन इन्हें मुजफ्फरनगर में ही रोक लिया गया उस दौरान उत्तर प्रदेश में तत्कालीन सरकार मुलायम सिंह यादव की थी। यहां राज्य आंदोलनकारियों की पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ भी हुई और उस दौरान अविभाजित उत्तर प्रदेश में हर तरफ कर्फ्यू लग गया। जिस पर कई लोगों को गंभीर चोटे भी आई काफी प्रयासों के बाद राज्य आंदोलन के लिए उठाई गई मांग सरकार द्वारा पूरी की गई और 9 नवंबर 2000 में उत्तर प्रदेश को विभाजित कर उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया। राज्य गठन के बाद अस्तित्व में आया उत्तरांचल से सभी उत्तरांचल वासियों को खासी उम्मीदें भी थी की राज्य गठन के बाद यह राज्य अपनी एक अलग पहचान बनाकर उभरेगा इनमें से कुछ उम्मीदें तो जनता की पूरी हुई लेकिन कुछ मानो सपना बनकर ही सिमट गई।

पौड़ी में जो विकास देखने को मिला उनमे गढ़वाल विश्वविद्यालय समेत राजकीय गोविंद बल्लभ पंत इंजीनियरिंग कॉलेज का खुलना और कई जगह पॉलिटेक्निक कॉलेज भी पौड़ी में संचालित किए जा रहे हैं। इसके साथ ही यहाँ जिला चिकित्सालय और महिला चिकित्सालय का खुलना भी है इसके साथ ही पौड़ी में हाई एल्टीट्यूड ट्रेनिंग सेन्टर के तौर पर पौड़ी में रांसी स्टेडियम का खुलना भी है। वहीं पौड़ी में विकास भवन का खुलना और कई नए कार्यालयों का खुलना भी पौड़ी के विकास को दिखाता है ,वहीं श्रीनगर गढ़वाल जोकि जनपद पौड़ी गढ़वाल की ही एक तहसील है यहां गढ़वाल विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर भी श्रीनगर में ही मौजूद है। जबकि आईटीआई सञ्चालन के साथ ही एनआईटी का अस्थाई परिसर का सञ्चालन भी श्रीनगर में संचालित हो रहा है। श्रीनगर गढ़वाल चार धाम की यात्रा का एक मुख्य पड़ाव और यात्रा मार्ग भी है। जिसके जरिए यात्री बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा आसानी से इस मार्ग से होकर कर सकते हैं कई सरकारी स्कूलों के साथ ही कई प्राइवेट स्कूल भी पौड़ी में खुले हैं।

हालांकि कुछ कार्य और विकास अब भी अवरुद्ध है जिसे जनता बयां करती है कई लोगों का मानना है की उत्तरांचल से वर्ष 2007 में सिर्फ राज्य का नाम बदल कर उत्तराखण्ड ही गया लेकिन पहाड़ वासियों की तकदीर नहीं बदल सकी। राज्य गठन के बाद से ही पहाड़ी क्षेत्रों का विकास मानो थम सा गया हो शिक्षा स्वास्थ्य पानी और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के ना मिलने से पहाड़ अब तक कर हा रहा है वहीं गढ़वाल मण्डल की कमिश्नरी बनने पर यहाँ पर जो 60 से अधिक मंडलीय कार्यालय खुले थे उनमें से 40 से अधिक मंडलीय कार्यालय अभी तक या तो देहरादून या अन्यत्र जगह शिफ्ट हो चुके हैं।

जबकि गढ़वाल कमिश्नरी में पूर्व में जहाँ 70 अधिकारी कर्मचारियों के बैठने से जो अलग रौनक छाई रहती थी उसे भी किसी की मानो नजर लग गई हो वर्तमान में कमिश्नरी में गिने चुने अधिकारी कर्मचारी ही कमिश्नरी में बैठा करते हैं। यही हाल जिले में मौजूद तमाम विभागों का भी है जहां फरियादी तो नजर आते हैं लेकिन उनकी समस्या का निराकरण करने वाले अधिकारी पौड़ी में कम ही समय में अपने दफ्तरों में नजर आते हैं। अधिकतर विभागीय अधिकारी हर शनिवार से पहले मुख्यालय छोड़ बिना सूचना के ही छुट्टी पर चले जाते हैं या देहरादून में सरकारी काम का बहाना कर गायब हो जाते हैं उसके बाद ये बुधवार या बृहस्पतिवार तक है मुख्यालय पहुंचते हैं इनमें से कई अधिकारी तो ऐसे हैं जो कि अपने दफ्तरों का भार देहरादून से ही संभाल रहे हैं ऐसे अधिकारियों से समस्या निस्तारण की उम्मीद लगाई जनता निराश और हताश नजर आ रही है।

बाइट देवानंद नौटियाल (राज्य आंदोलनकारी)

वहीं पृथक राज्य बनने पर लोगों को सरकारों से निराशा ही हाथ लगी है यही वजह है की पौड़ी में पलायन ने तेजी से अपने पांव पसारे हैं पलायन के चलते इस जिले के कई गांव खाली होकर वीरान हो चुके हैं जिन्हें घोस्ट विलेज के नाम से जाना जा रहा है वहीं पूर्व से ही खेती की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए के लिए आवाजें उठती रही लेकिन आज भी जंगली जानवर खेती चौपट कर रहे हैं जिसके लिए आप तक कोई ठोस नीति धरातल पर नजर नहीं आ रही है। इसके लिए चकबंदी की मांग मांग भी लंबे समय से की जा रही है वही फैनसिंग की मांग भी जंगली जानवरों के आतंक से खेतों को बचाने के लिए की जा रही है जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई है।