भारतीय संविधान के विकास का संक्षिप्त इतिहास

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अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की बनीं सीढ़ियां …..

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

देश के संविधान से जुड़ी 10 खास बातें

सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित किया है। आज हमारा संविधान 65 साल का हो गया है। जानिए इससे जुड़ी खास बातें :-
  • देश का सर्वोच्‍च कानून हमारा संविधान 26 नवंबर, 1949 में अंगीकार किया गया था।
  • संविधान सभा को इसे तैयार करने में दो साल, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा।
  • संविधान सभा पर अनुमानित खर्च 1 करोड़ रुपये आया था।
  •  मसौदा लिखने वाली समिति ने संविधान हिंदी, अंग्रेजी में हाथ से लिखकर कैलिग्राफ किया था और इसमें कोई टाइपिंग या प्रिंटिंग शामिल नहीं थी।
  • संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव अम्बेडकर, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे।
  • 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की बैठक में डॉ। राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहें।
  • इसमें अब 465 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है। इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं।
  • संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता को मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रमुख पीएम होगा।
  • हमारा संविधान विश्‍व का सबसे लंबा लिखित संविधान है।
  • आज से ठीक 71 वर्ष पहले भारतीय संविधान तैयार करने एवं स्वीकारने के बाद से इसमें पूरे 100 संशोधन किए जा चुके हैं।
इतिहासकार बताते हैं कि जब बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा। इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं और आज देश इसी से संचालित हो रहा है। 
1757 ई. की प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. में बक्सर के युद्ध को अंग्रेजों द्वारा जीत लिए जाने के बाद बंगाल पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन का शिकंजा कसा। इसी शासन को अपने अनुकूल बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने समय-समय पर कई एक्ट पारित किए, जो भारतीय संविधान के विकास की सीढ़ियां बनीं। ये एक्‍ट्स इस प्रकार थे:
(1) 1773 ई. का रेग्‍यूलेटिंग एक्ट: इस एक्ट के अन्‍तर्गत कलकत्ता प्रेसिडेंसी में एक ऐसी सरकार स्थापित की गई, जिसमें गवर्नर जनरल और उसकी परिषद के चार सदस्य थे, जो अपनी सत्ता का उपयोग संयुक्त रूप से करते थे। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:(i) कंपनी के शासन पर संसदीय नियंत्रण स्थापित किया गया।
(ii) बंगाल के गवर्नर को तीनों प्रेसिडेंसियों का जनरल नियुक्त किया गया।
(iii) कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई।
(2) 1784  ई. का पिट्स इंडिया एक्ट: इस एक्ट के द्वारा दोहरे प्रशासन का प्रारंभ हुआ-
(i) कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स- व्यापारिक मामलों के लिए।
(ii) बोर्ड ऑफ कंट्रोलर- राजनीतिक मामलों के लिए।
(3) 1793 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों तथा कर्मचारियों के वेतन आदि को भारतीय राजस्व में से देने की व्‍यवस्‍था की गई।
(4) 1813 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा
(i) कंपनी के अधिकार-पत्र को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया।
(ii) कंपनी के भारत के साथ व्यापर करने के एकाधिकार को छीन लिया गया। लेकिन उसे चीन के साथ व्यापर और पूर्वी देशों के साथ चाय के व्यापार के संबंध में 20 सालों के लिए एकाधिकार प्राप्त रहा।
(iii) कुछ सीमाओं के अधीन सभी ब्रिटिश नागरिकों के लिए भारत के साथ व्यापार खोल दिया गया।
(5) 1833 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके द्वारा
(i) कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए।
(ii) अब कंपनी का कार्य ब्रिटिश सरकार की ओर से मात्र भारत का शासन करना रह गया।
(iii) बंगाल के गवर्नर जरनल को भारत का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा।
(iv) भारतीय कानूनों का वर्गीकरण किया गया तथा इस कार्य के लिए विधि आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था की गई।
(6) 1853 ई. का चार्टर अधिनियम: इस अधिनियम के द्वारा सेवाओं में नामजदगी का सिद्धांत समाप्त कर कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर भरने की व्यवस्था की गई।
(7) 1858 ई. का चार्टर अधिनियम: इसके तहत
(i) भारत का शासन कंपनी से लेकर ब्रिटिश क्राउन के हाथों सौंपा गया।
(ii) भारत में मंत्री-पद की व्यवस्था की गई।
(iii) 15 सदस्यों की भारत-परिषद का सृजन हुआ।
(iv) भारतीय मामलों पर ब्रिटिश संसद का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया।
(8) 1861 ई. का भारत शासन अधिनियम: इसके तहत
(i) गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार किया गया।
(ii) विभागीय प्रणाली का प्रारंभ हुआ।
(iii) गवर्नर जनरल को पहली बार अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई।
(iv) गवर्नर जरनल को बंगाल, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में विधान परिषद स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई।
(9) 1892 ई. का भारत शासन अधिनियम: इसके तहत
(i) अप्रत्यक्ष चुनाव-प्रणाली की शुरुआत हुई।
(ii) इसके द्वारा राजस्व एवं व्यय अथवा बजट पर बहस करने तथा कार्यकारिणी से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई।
(10) 1909 ई. का भारत शासन अधिनियम (मार्ले -मिंटो सुधार) : इसके तहत
(i) पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया।
(ii) भारतीयों को भारत सचिव एवं गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषदों में नियुक्ति की गई।
(iii) केंद्रीय और प्रांतीय विधान-परिषदों को पहली बार बजट पर वाद-विवाद करने, सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव पेश करने, पूरक प्रश्न पूछने और मत देने का अधिकार मिला।
(iv) प्रांतीय विधान परिषदों की संख्या में वृद्धि की गई।
(11) 1919 ई. का भारत शासन अधिनियम [मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार]: इसके तहत
(i) केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई- प्रथम राज्य परिषद तथा दूसरी केंद्रीय विधान सभा। राज्य परिषद के सदस्यों की संख्या 60 थी; जिसमें 34 निर्वाचित होते थे और उनका कार्यकाल 5 वर्षों का होता था। केंद्रीय विधान सभा के सदस्यों की संख्या 145 थी, जिनमें 104 निवार्चित तथा 41 मनोनीत होते थे। इनका कार्यकाल 3 वर्षों का था। दोनों सदनों के अधिकार समान थे। इनमें सिर्फ एक अंतर था कि बजट पर स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार निचले सदन को था।
(ii) प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली का प्रवर्तन किया गया। इस योजना के अनुसार प्रांतीय विषयों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया- आरक्षित तथा हस्तांतरित। आरक्षित विषय थे – वित्त, भूमिकर, अकाल सहायता, न्याय, पुलिस, पेंशन, आपराधिक जातियां, छापाखाना, समाचार पत्र, सिंचाई, जलमार्ग, खान, कारखाना, बिजली, गैस, व्यालर, श्रमिक कल्याण, औघोगिक विवाद, मोटरगाड़ियां, छोटे बंदरगाह और सार्वजनिक सेवाएं आदि।
हस्तांतरित विषय:-
(i) शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, स्थानीय स्वायत्त शासन, चिकित्सा सहायता।
(ii) सार्वजनिक निर्माण विभाग, आबकारी, उघोग, तौल तथा माप, सार्वजनिक मनोरंजन पर नियंत्रण, धार्मिक तथा अग्रहार दान आदि।
(iii) आरक्षित विषय का प्रशासन गवर्नर अपनी कार्यकारी परिषद के माध्यम से करता था; जबकि हस्तांतरित विषय का प्रशासन प्रांतीय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों के द्वारा किया जाता था।
(iv) द्वैध शासन प्रणाली को 1935 ई० के एक्ट के द्वारा समाप्त कर दिया गया।
(v) भारत सचिव को अधिकार दिया गया कि वह भारत में महालेखा परीक्षक की नियुक्ति कर सकता है।
(vi) इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान किया।