भारत-चीन संबंधों में अहम समस्या सीमा विवाद और अविश्वास

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दूसरा विवाद कारण है चीन का भारत के प्रति विश्वसनीय न होना 

आर्थिक सहयोग से राजनीतिक समस्या का समाधान संभव नहीं

कमल किशोर डुकलान
एक ओर भारत सहित पूरे विश्व में कोरोना संक्रमण काल चल रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन के संबंधों में विवाद गहराते जा रहें हैं। विवादों का मुख्य कारण भारत चीन सीमा विवाद तो है ही,दूसरा चीन का भारत के प्रति विश्वसनीय न होना भी है।
दोनों देशों के प्रतिनिधियों की कई बार मुलाकात होने के बाद भी सीमा विवाद पर आजादी के सात दशक बाद किसी तरह का समाधान न निकलने के कारण समाधान के लिए समझौतों पर कोई ठोस उपलब्धि नहीं मिल पाई।
चीन संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों पर अन्य पड़ोसी देशों के सामने भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने की पहल तो करता है,वहीं दूसरी ओर चीन भारत के साथ कृमिक समाधान भी चाहता है। चीन आर्थिक व्यापार को अधिक महत्व देता है और भारत को हमेशा से ही एक उभरते हुए आर्थिक बाजार के रूप में देखता है।भारत सीमा विवाद को सुलझाने के सिवाय हर तरह के संबंधों को बेमानी समझता है।
चीन अरुणाचल प्रदेश को विवादित क्षेत्र बताता है, जबकि यह बात भारत को किसी तरह से पसंद नहीं है। भारत का दृष्टिकोण साफ है कि सीमा विवाद को पहले सुलझाना चाहिए। भारत इस बात को भली-भांति जानता है कि आर्थिक सहयोग से राजनीतिक समस्या का समाधान संभव नहीं है, जैसा कि पाकिस्तान के साथ हो रहा है। आर्थिक सहयोग राजनीतिक समस्या का बलि चढ़ रहा है।
चीन प्रारंभ से ही भारत के घोर विरोधी पड़ोसी देश पाकिस्तान को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रुप से समर्थन करता ही रहता है। लगातार चीन अपनी कूटनीतिक चाल से भारत को अंतर्राष्ट्रीय मोर्चो पर कमजोर करने का भी प्रयास करता रहता है। जिससे भारत का हर तरह से अहित हो सकें।
दूसरी तरफ चीन भारत से मुक्त व्यापार द्वारा भारत का ट्रैफिक अधिक होने के कारण चीन चाहता है कि भारत की ट्रेंड एरिया बने, मगर भारत का इससे नुकसान होगा। भारत को राजस्व की हानि उठानी पड़ेगी
वर्तमान समय में भारत सूचना प्रोद्यौगिकी और सेवा क्षेत्र की बदौलत चीन के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है चीन की उत्पादन प्रणाली भारत से काफी मजबूत होने के कारण भारत के आर्थिक बाजार पर पूरी तरह से कब्जा करना चाह रहा है। वर्तमान समय में उरी हमले से पहले मतभेदों के प्रबंधन के स्थान पर संबंधों की मजबूती का दौर कहा जाता था, दोनों देश में कुछ मुद्दों को छोड़कर अन्य नए क्षेत्रों में सहयोग में निरंतर वृद्धि हो रही थी।
चीन एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुका है, जो कि भारत के लिए चुनौती से कम नहीं है। चीन का आर्थिक विकास भी उसे एक बहुत बड़े बाजार के रूप में पेश करता है, जो भारत के लिए एक सुअवसर भी कहा जाएगा। चीन की सेना का आधुनिकीकरण भी हो रहा है और चीन का प्रभाव भी पड़ोस के देशों मे बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में भारत को भी अपनी सेना को और आधुनिक करना होगा, पड़ोसी देशों से संबंधों को और अधिक मजबूती प्रदान करनी होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से हालांकि इसी नीति को अपनाया जा रहा है, जिसके चलते पाकिस्तान को छोड़कर बाकी पड़ोसी देशों से संबंध काफी बेहतर हुए हैं, जिसका भारत को लाभ भी मिला है। यही कारण रहा कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान पड़ोसी देशों से समर्थन जुटाने मे नाकाम रहा और अलग-थलग पड़ गया।
भारत और चीन का प्रमुख मामला सीमा विवाद है, जिसके चलते भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच 18वें चक्र की वार्ता का आयोजन नई दिल्ली में 23 मार्च, 2015 को हुआ था, जिसमें भारत की तरफ से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत डोभाल और चीन के राज्य कांउसलर जिची ने वार्ता में भाग लिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता का यह पहला चक्र था, वार्ता दोनों के प्रतिनिधियों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई थी। इस वार्ताच्रक में अब तक हुई वार्ताओं की व्यापार समीक्षा की गई और पिछली वार्ताओं पर संतोष व्यक्त करने के साथ ही सीमा विवाद का परस्पर स्वीकार्य निष्पक्ष एवं तर्क संगत समाधान निकालने के लिए तीन चरण की प्रकिया अपनाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई थी।
भारत और चीन के प्रतिनिधियों की ओर से तय किया गया कि सीमा पर बिना किसी उकसावे के शांति बनाए रखी जाएगी। भारत और चीन की सीमा विवाद के लिए अब तक 18 चक्र की वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन सीमा विवाद बढ़ता ही जा रहा है,जिसका अबतक कोई स्थायी हल नहीं निकल पाया है। यही दोनों देशों के संबंधों की एक प्रमुख समस्या है। बगैर विवाद का हल निकाले दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते। भले ही दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में काफी प्रगति हुई हो।
चीन प्रारंभ से ही सीमा विवाद को दो हजार किलीमीटर के दायरे को मानता है, जिसका अधिकांश क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश में पड़ता है, जबकि भारत सीमा विवाद को चार हजार किलोमीटर तक का मानता है। जो अरुणाचल प्रदेश तक फैला है। पिछले दिनों जब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की अरुणाचल की यात्रा हुई थी तो चीन ने इसका विरोध किया था। हम सब जानते हैं,कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक स्वतंत्र राज्य है। भारत का मानना है कि चीन विवाद पश्चिमी सीमा तक है, जिस पर चीन अनाधिकृत रूप से कब्जा जमाए बैठा है।