मोदी की बजाय राहुल गांधी की सरकार होती तो क्या होता?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राम मंदिर के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में आज जितनी बड़ी लीला हुई है, उतनी बड़ी लीलाएं पिछले 50 साल में कम ही हुई हैं। रामभक्तों की संख्या कोई दस लाख बता रहा है, कोई पांच लाख तो कोई डेढ़-दो लाख ! संख्या जो भी हो, इस प्रदर्शन ने भाजपा की मोदी सरकार के लिए भयंकर दुविधा खड़ी कर दी है।
विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिंदू संगठनों ने मिलकर यह एतिहासिक प्रदर्शन किया है। ये सभी संगठन भाजपा के मूलाधार हैं। इनके बिना भाजपा एक खाली झुनझुना है। इन संगठनों ने मांग की है कि सरकार कानून लाए और मंदिर बनाए। अयोध्या-विवाद को खत्म करे। इस प्रदर्शन के वक्ताओं ने सरकार से दो-टूक शब्दों में राम मंदिर बनाने का आग्रह किया है।
हम जरा कल्पना करें कि दिल्ली में आज मोदी की बजाय राहुल गांधी की सरकार होती तो क्या होता ? ऐसी स्थिति में यह आग्रह तो होता ही, धमकियां भी होतीं। निंदा भी होती, कटु भर्त्सना भी होती और वक्तागण पूछते कि यह सरकार साढ़े चार साल सोती क्यों रही ? यह कुंभकर्ण क्यों बनी रही ? वक्ता यह भी कहते कि ऐसी निकम्मी कांग्रेस सरकार को 2019 के चुनाव में एक भी सीट नहीं मिलनी चाहिए।
उसके प्रधानमंत्री को पाकिस्तान में धकेल देना चाहिए या उसे बाबर के जन्म गांव ‘ओश’ में भिजवा देना चाहिए लेकिन ये हिंदू संगठन बेचारे मेादी को क्या कहें ? किस मुंह से कहें ? वे टीवी चैनलों और अखबारों को इस सवाल का जवाब ही नहीं दे पा रहे हैं कि आपको मंदिर की याद अभी ही अचानक क्यों आई ? क्या चुनाव जीतने का यही एक मात्र पैंतरा अब मोदी के पास बचा हुआ है ? यदि सरकार ने मंदिर का कानून पास नहीं किया तो क्या ये हिंदू संगठन इस सरकार को उल्टाने के लिए तैयार होंगे ? सच तो यह है कि इस सरकार के पास अपना कोई दिमाग नहीं है।
सोच के मामले में वह दिवालिया है, दरिद्र है, शून्य है। वह नौकरशाहों की नौकर है। नौकरशाहों ने पहले ही नोटबंदी, जीएसटी और विदेश नीति में सरकार को गच्चा खिला दिया है। सर्वज्ञजी को किसी सलाह की जरुरत नहीं है। वे बस बोलना जानते हैं। पढ़ने-लिखने और सोचने-समझने से उन्हें परहेज़ है। वरना अयोध्या-विवाद का हल तो 1993 के नरसिंहराव सरकार के अध्यादेश में ही लिखा हुआ है। 70 एकड़ जमीन में भव्य राम मंदिर तो बने ही, वहां मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा, साइनेगाॅग, धर्मशाला, सर्वधर्म संग्रहालय जैसी कई चीजें बन जाएं तो राम की अयोध्या विश्व-तीर्थ बन जाएगी। इसमें अदालत और संसद का क्या काम है ? इसमें सरकार का भी कोई काम नहीं है।
धर्म-निरपेक्ष सरकार मंदिर बनाने का जिम्मा कैसे ले सकती है ? सरकार का एक ही काम है। वह यह है कि तीनों याचिकाकर्त्ताओं को उक्त कार्य के लिए सहमत करवाए और सर्वसम्मति से सर्वधर्मतीर्थ का अध्यादेश या कानून बनाए।
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