अंधेर नगरी, चौपट राज…….

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उत्तराखंड में लाखों होनहार युवाओं के भविष्य से खिलवाड़!

कैसे लूटे जा रहे गरीब मां बाप के खून पसीने की कमाई?

विजेंद्र रावत की फेसबुक से साभार 
सोचते-सोचते आधी रात को नींद उखड़ी तो सो न सका और आपके लिए देवभूमि की एक छोटी सी शोषण गाथा बताने का प्रयास कर रहा हूं।
मैं यह सच्ची विभत्स शोषण कथा एक छोटे से उदाहरण से कर रहा हूं। 2017 में सरकार ने वनविभाग के लिए 1218 वन रक्षक के पद निकाले थे, प्रदेश के युवाओं के आंखों में इस नौकरी के सपने तैरने लगे। डेढ़ लाख युवाओं ने इसके लिए फार्म भरे। फार्म फीस थी एस सी, एस टी के लिए 150 और सामान्य के लिए 300 रुपये।
फिर शहर और कस्बों में खुली कोचिंग की दुकानों की मौज आने लगी, ध्यान रहे इस साधारण सी नौकरी में किसी मंत्री, विधायक व बड़े नौकरशाहों के सपूत नहीं सिर्फ़ गरीबों के होनहार बच्चे शामिल हैं। सरकारी लापरवाही व गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण ये भर्ती परीक्षा टलती रही या टाली गई।
और इसकी परीक्षा सरकार के अधिनस्त कर्मचारी चयन आयोग द्वारा 2020 में लिखित परीक्षा कराई गई जिसमें 1 लाख 19 हजार अभ्यार्थियों ने हिस्सा लिया बाकि 29 हजार कहां गायब हो गये पता नहीं ?
परीक्षा से पहले ही चर्चा चली कि इस भर्ती के लिए 8 से 15 लाख रुपए की कालाबाजारी खुली है। फिर पता चला कि परीक्षा से पहले पेपर लिक हो गये।
अपने मां बाप के खून पसीने की कमाई के लाखों खर्च करने वाले बच्चों व उनके अविभावकों पर यह किसी बज्रपात से कम नहीं था।
खैर, प्रदेश की ईमानदार सरकार ने इसकी जांच के लिए एक पुलिस अधिकारी की अध्यक्षता में विशेष जांच दल बना दिया और रुड़की के कुछ लड़कों को पकड़कर जेल में डाल दिया। एक सवाल वहीं खड़ा है कि क्या लाखों की रिश्वत देने की चर्चा की जांच हुई? क्या एक पुलिस अधिकारी राज्य के बड़े आकाओं की जांच कर सकता है? कहीं कुछ लड़कों की धरपकड़ कर रिश्वतखोरों का रास्ता तो साफ नहीं किया जा रहा है?
यह पूरी परीक्षा प्रक्रिया संदेह के घेरे में है इसलिए कड़ी निगरानी में यह परीक्षा दोबारा कराई जानी चाहिए।
अब सरकार के मुखिया से कुछ सवाल हैं?
डंडा लेकर जंगल की रखवाली करने वाले साधारण से वन रक्षक क्या इसरो का वैज्ञानिक हैं जिसके लिए गरीबों के बच्चों को तीन चार साल तक ट्यूसन की भट्टी में झोंककर उन्हें बंधुवा मजदूर बनाया गया क्योंकि इस परीक्षा के कारण वह कुछ और काम भी नहीं कर सका।
एक बच्चे का अगर इस पढ़ाई में साल में एक लाख भी खर्च हुआ तो सौ युवाओं का एक करोड़, हजार का दस करोड़, एक लाख युवाओं का हजार करोड़ और डेढ़ लाख युवाओं ने साल में अपने मां बाप का 1500 करोड़ फूंक डाला।
चार साल में यह राशि 6 हजार करोड़ हो गई है और नौकरी की प्रक्रिया अब भी अधर में है, यदि नौकरी मिली भी तो 1218 पदों को छोड़ बाकी सड़क पर ही होंगे। इनमें से कुछ की नौकरी की उम्र निकल जाएगी।
युवा और उनके अभिभावकों की इस तबाही का जिम्मेदार कौन है?
सरकार को 6 माह में परीक्षा करके बाकी युवाओं को अपने काम के लिए मुक्त कर देना चाहिए था।
यही हाल 2017 में निकाले गये 150 आवकारी व परिवहन पुलिस सिपाही पदों का है, इसके लिए 90 हजार युवाओं ने आवेदन किया और अब तक यह नियुक्तियां भी अधर में लटकी है, इन युवाओं के शोषण का गणित भी वही है।
सिर्फ दो नौकरियों के लिए गरीबों के नौ हजार करोड़ रुपए की होली जलाई जा रही है और लाखों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़?
इसके लिए कोई जन प्रतिनिधि व 2022 में सत्ता का सपना देख रही कांग्रेस सवाल क्यों नहीं उठा रही है ? क्या इसलिए कि इस सरकारी शोषण की चक्की में उनके होनहार बच्चे नहीं पिसे जा रहे हैं?
या हमाम में सब नंगे हैं?
युवाओं को सरकार व चुनाव में नेताओं के नारे लगाने से पहले उनसे इन मुद्दों पर सवाल पूछने चाहिए। जब हम शराब और मुर्गों की दावतों से प्रतिनिधि चुनेंगे तो उसके परिणाम भी ऐसे ही दर्दनाक व भयावह होंगे।
वरना उत्तराखंड जलता रहेगा और यहां के नीरू बंशी बजाते रहेंगे।