• इस चुनाव में बड़े नेताओं में से अधिकतर अपने स्तर से नीचे उतरे !
  • कमियों को गिनाने  और उन्हें नीचा दिखाने की हुई कोशिश
  • अब मतदाता संकीर्णताओं से ऊपर उठकर वोट डालें

रमेश पहाड़ी

लोकसभा के प्रथम चरण के चुनाव के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने अपनी तैयारियां पूरी कर लीं हैं और राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा भी कम समय के बावजूद अपने कार्यों, नीतियों व भावी कार्यक्रमों के बारे में मतदाताओं को जानकारी दे दी गई है। बड़े नेताओं में से अधिकतर ने अपने स्तर से काफी नीचे उतर कर वोट को अपने दल व प्रत्याशियों के पक्ष में मोड़ने के लिए भी भारी प्रयास किये हैं और अपने विरोधियों की कमियों को गिनाने के साथ-साथ अनर्गल आरोप-प्रत्यारोपों द्वारा उनको नीचा दिखाने की भी भरपूर कोशिश की गई है।

हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर जिस लोकतंत्र की स्थापना कर, सत्ता में आम जन की भागीदारी का जो दायित्व संविधान के द्वारा देश के प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध कराया है, उसको पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार अथवा निर्वाचन आयोग की बजाय देश के मतदाताओं की है। सरकार और निर्वाचन आयोग उसके लिए आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने और प्रक्रियाओं को विधिसम्मत ढंग से संचालित करने मात्र के लिए जिम्मेदार है। इसलिए अब मतदाताओं की जिम्मेदारी है कि वे दल, क्षेत्र, जाति, वर्ग की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर योग्यतम प्रत्याशी को अपना वोट डालें और संविधान की भावना के अनुरूप अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करें।

हमारे संविधान में बहुदलीय प्रणाली के साथ ही दलविहीन अथवा स्वतंत्र प्रत्याशी का प्राविधान भी इसलिए किया गया है कि वोटर योग्यतम प्रत्याशी को वोट दे और सरकार बनाने व चलाने हेतु अपना प्रतिनिधित्व उसे सौंपें। देश के प्रत्येक नागरिक को इस मामले में समान अधिकार दिया गया है। भारत के सर्वोच्च शासक राष्ट्रपति और सबसे छोटे कर्मचारी अथवा राजा से लेकर रंक तक सबको एक वोट देने का अधिकार है। इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें प्रत्येक नागरिक समान अधिकार रखता है और सत्ता का संचालन उसके द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का मंडल करता है, कोई एक व्यक्ति नहीं। राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च शासक होता है लेकिन वह बिना मंत्रिपरिषद की राय के कुछ भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए जो मंत्रिपरिषद होती है, उसका मुखिया प्रधानमंत्री अवश्य होता है लेकिन उसे भी मंत्रिपरिषद की राय लेनी होती है, अकेले वह भी कोई निर्णय नहीं ले सकता। संविधान में ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि सरकार का कोई भी पदाधिकारी, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा राज्यपाल या मुख्यमंत्री क्यों न हो, अकेले में कोई निर्णय न ले सके और किसी भी प्रकार का या स्तर पर अधिनायकवाद न पनपने पाए।

उत्तराखंड में प्रथम चरण में 11 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। निर्वाचन तंत्र द्वारा इसके लिए तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। 9 अप्रैल को सायं 5 बजे प्रत्याशियों व दलों द्वारा प्रचार समाप्त कर दिया जाएगा और अगले 38 से 48 घंटे मतदाताओं को विचार के लिए समय होगा कि वे किसे वोट देकर अपना भाग्य अथवा प्रतिनिधित्व सौपेंगे, जो कि उनकी आशाओं-आकांक्षाओं को पूरा करने में सहयोगी बनेगा, उनको प्रगतिशील नेतृत्व देकर आगे बढ़ाएगा, उनकी समस्याओं के समाधान में उनका कुशल नेतृत्व करेगा। इसलिए यह समय है कि हम अपने विवेक का प्रयोग करते हुए बड़ी संख्या में वोट देने पहुँचें और विचारपूर्वक अपना वोट डालकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार का सही उपयोग करें। इस अवसर पर यह अवश्य ध्यान रखना होगा कि हम देश को एक स्वस्थ लोकतांत्रिक सरकार बनाने के लिए अपनी संवैधानिक शक्ति का उपयोग कर रहे हैं, न कि किसी क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए अथवा केवल खानापूर्ति के लिए। अब समय आ गया है कि हम अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार का, जो हमारे पास अपनी मनमाफिक सरकार बनाने का एक बड़ा हथियार है, का उपयोग सोच-समझ कर अवश्य करें और देश की व्यवस्था के संचालन में अपनी संवैधानिक शक्ति का उपयोग अवश्य करें, एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें।

लोकतंत्र कू फ़र्ज़ निभावा……
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देश-धरम च
सब लोखूं तैं धैइ लगावा
लोकतंत्र कू पर्व अयूं च
उठ खड़ा ह्वावा।

अपणा भोट कू मान बढ़ावा।
भोट द्यवा, सब भोट द्यवा।

य्वीच् बग्त जब हम सब 
अपणो भाग बणौला
कन होलु राज हमारू, 
न्यत्ता, हम तै करला
अपणा भोट से अपणैसै
सरकार बणावा।

लोकतंत्र कू पर्व अयूँ च
बूथ जवा, सबि भोट द्यवा।

येका खातिर वीर-भड़ून 
ज्यान् लड़ाये
मां-बैण्यूंन स्वाग-भाग
अर् क्वौख गँवाये
बलिदान्यूं कू कर्ज उतारा
देस का खातिर फर्ज निभावा।

लोकतंत्र की तागत बणा दौं
भोट द्यवा, सब भोट द्यवा।

जन हम जांदा कथा-बर्त मां
ब्यौ-बरात, खेळा-मेळा मां
सुख-दुख मां हम जन
समाज कू फर्ज निभौंदा
तनि यु देस कू फर्ज हमारू
भला मनखि तैं भोट देक
यो फर्ज निभावा।

लोकतंत्र की तागत बणजा
भोट द्यवा, सब भोट द्यवा।

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