संतों की कुंभ को प्रतीकात्मक मनाने की अनुकरणीय पहल

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कुंभ में संत परम्परा के अखाड़ों ने समाज को राह दिखाने का किया काम

कमल किशोर डुकलान

कोरोना संक्रमण की चैन तोड़ने में संत समाज के परम्परागत अखाड़ों द्वारा महाकुंभ को प्रतीकात्मक मनाने एवं आगे के शाही स्नानों को समाप्त करने की घोषणा करना जीवन रक्षा के उपायों को पहली प्राथमिकता देकर बड़े मन का परिचय दिया है। चुनावी रैलियों में व्यस्त विभिन्न राजनीतिक दलों को भी कोरोना संक्रमण की चैन तोड़ने में संत परम्परा से जुड़े अखाड़ों का अनुसरण करना चाहिए।

कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए संत समाज द्वारा महाकुंभ के आने वाले आगे के शाही स्नानों को प्रतीकात्मक मनाने एवं  कुंभ की विधिवत समापन की घोषणा कर  संत परम्परा ने समाज को जो राह दिखाने का जो काम किया,उसके लिए संत समाज के परम्परागत अखाड़े को साधुवाद तो दिया ही जा सकता है,जिन्होंने इस महामारी को रोकने में अपने बड़े मन का परिचय दिया है। धार्मिक संगठनों का एक बड़ा दायित्व समाज और देश को राह दिखाना ही होता है। महाकुंभ को समाप्त किया जाना इसलिए भी आवश्यक था,क्योंकि कुंभ आने वाले कई श्रद्धालुओं के साथ कुछ संत भी कोरोना संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। कुछ की इस संक्रमण से मौतें भी हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में ऐसे किसी विचार के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता कि कैसी भी परिस्थिति हो,धार्मिक रीति-रिवाज नहीं छोड़े जा सकते।जीवन संचालन परिस्थितियों के हिसाब से ही किया जाना चाहिए, क्योंकि कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं,जिनसे टकराने से कोई लाभ नहीं होता। जब कोई बीमारी महामारी का रूप ले ले तो जीवन रक्षा के लिए जो भी करना पड़े,वह आगे बढ़कर किया जाना चाहिए जो इस बार कुंभ में संत परम्परा के अखाड़ों ने किया है।

कोरोना संक्रमण से उपजी महामारी ने जो संकट खड़ा कर दिया है, उसका सामना करना और इस क्रम में जीवन रक्षा के उपायों को पहली प्राथमिकता देना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। इस मांग की पूर्ति कुंभ में जुटे अखाड़ों के साथ-साथ अन्य सभी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों को भी करनी चाहिए,वे चाहे जिस मत-मजहब,पंथ-समुदाय से ही जुड़े क्यों न हों। वर्तमान समय में इसकी जरूरत इसलिए भी है,क्योंकि दुर्गा पूजा एवं रमजान  का एक सिलसिला कायम होता दिख रहा है। इन दिनों एक ओर जहां नवरात्र के चलते देश भर में विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन हो रहे हैं,वहीं रमजान के कारण भी। आगे ईद के साथ अन्य पर्व भी हैं। इन सबमें ऐसा कोई काम नहीं किया जाना चाहिए, जिससे भीड़ एकत्रित हो और कोरोना संक्रमण के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मुश्किलें पैदा की जा सकें। यदि यह स्मरण रखा जाए तो जो अपेक्षित है,उसकी पूर्ति कहीं आसानी से होगी। भारतवर्ष धर्मनिरपेक्ष विभिन्न मत-मजहबों वाला देश है, जिसके मूल में मानव कल्याण है। अब जब धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करते दिख रहे हैं,तब फिर यह भी आवश्यक हो जाता है कि चुनावों में व्यस्त विभिन्न राजनीतिक दल भी कोरोना संक्रमण की चैन तोड़ने में संत परम्परा से जुड़े अखाड़ों का अनुसरण करें।