“अंतर्विरोधों में घिरी प्रदेश बीजेपी न दे सकी ”आप ” की चालों को मात

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दिल्ली विधानसभा चुनाव विश्लेषण

केवल मुफ्त की सुविधाओं के नाम पर आम आदमी पार्टी ने दोबारा ऐतिहासिक जीत हासिल की है, यह कहना सच्चाई से नजरें चुराना जैसा

बीजेपी की करारी हार में दिल्ली नगर निगम का भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण

भाजपा ने टिकटों को लेकर आखिरी दिन तक मथापच्ची करने के बावजूद उल्टे सीधे उम्मीदवार मैदान में उतारे

अतुल सिंघल

आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने दिखा दिया कि चुनाव कैसे जीते जाते हैं। रणनीति, कॉऑरडिनेशन, चालाकी, राजनीतिक समझ, परिपक्वता और कार्यकर्ताओं की हौसला अफजाई दिल्ली विधानसभा के चुनावों में अरविंद केजरीवाल ने इन सभी बातों का परिचय दिया। चुनावों से ठीक पहले केजरीवाल ने दिल्ली की जनता को बिजली/पानी जैसी मुफ्त की सुविधाओं का तोहफा दिया उसकी कोई काट भाजपा नहीं ढूंढ पाई। लेकिन केवल मुफ्त की सुविधाओं के नाम पर आम आदमी पार्टी ने दोबारा ऐतिहासिक जीत हासिल की है, यह कहना सच्चाई से नजरें चुराना जैसा होगा।

सही मायने में केजरीवाल अपने कार्यकर्ताओं की एक बड़ी और मजबूत टीम भी खड़ी करने में कामयाब रहे । कोई भी चुनाव जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और संगठन के लोगों व्दारा ही लड़ाया जाता है। अपने दो विधानसभा चुनावों से केजरीवाल ने इन बातों को अच्छी तरह से समझ लिया था। केजरीवाल ने यह भी समझ लिया कि जैसे भूखे पेट भजन नहीं हो सकता, वैसे ही खाली पेट कार्यकर्ता पार्टी का काम नहीं कर सकता। लिहाजा उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को इस तरह से काम पर लगाया कि उन्हें एक तयशुदा रकम हर माह मिलने लगी।

दिल्ली सचिवालय, दिल्ली विधानसभा, मंत्रालयों, अलग अलग सरकारी विभागों से लेकर डोर-स्टेप-डिलीवरी, मोहल्ला क्लिनिक, बसों में मार्शल, अस्पताल की समितियों, स्कूलों की कमेटियों में के नाम पर आम आदमी पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं को नियमित आर्थिक लाभ पहुंचा कर उपकृत किया गया। वहीं निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी पर लगाम लगाई। भाजपा कभी इन विषयों की गहराई को नहीं समझ सकी और न ही इस मुद्दे पर कभी पार्टी ने आवाज उठाई।

केजरीवाल ने बेहद सधे तरीके से मीडिया का भी इस्तेमाल किया। उन्होंने फील्ड में काम करने वाले संवाददाताओं को छोड़ कर बड़े बड़े विज्ञापन देकर सीधे मीडिया मालिकों को साधा और उनका बेहतरीन इस्तेमाल कर दिखाया। लिहाजा कोई भी नगेटिव खबर चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान दिखाई नहीं दी। इतना ही नहीं केजरीवाल खुद मीडिया की भारी-भरकम वैन लेकर चुनाव के दौरान दिल्ली भर में घूमते रहे और टीवी चैनलों के जरिये प्रचार करते रहे। जबकि भाजपा नेता तर्कहिन संवाद और टीवी डिबेट में ही उलझे रहे।

भाजपा पर वोटों का ध्रुवीकरण करने का आरोप लगा। लेकिन केजरीवाल बड़ी ही चालाकी से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब हो गए। सिसोदिया के बयान के बाद शाहिन बाग से हुए ध्रुवीकरण का बड़ा फायदा केजरीवाल को मिला। मुस्लिम प्रभाव वाले इलाकों में मिले जबरदस्त वोट इस बात का प्रमाण है। इमामो को वेतन देकर इसकी बुनियाद वो पहले ही रख चुके थे।

विधानसभा चुनावों से पहले केजरीवाल ने अपने 16 विधायकों के टिकट काट दिए और उनकी जगह सामाजिक समीकरणों को देखते हुए मजबूत उम्मीदवार उतार कर सबको चौका दिया। आम आदमी पार्टी ने सबसे पहले और एक साथ सभी 70 विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा करके यह संदेश दिया कि पार्टी में कोई खींचतान नही है। वहीं भाजपा ने टिकटों को लेकर आखिरी दिन तक मथापच्ची करने के बावजूद उल्टे सीधे उम्मीदवार मैदान में उतारे। अगर ये कहा जाए कि टिकटों की बन्दर बांट की गई तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

बीजेपी की करारी हार में दिल्ली नगर निगम का भ्रष्टाचार एक प्रमुख कारण है। केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप बीजेपी के नेताओं ने खूब लगाए लेकिन निगम से इसे हटाने के लिए कोई पहल नहीं की। अलबत्ता इसके ज्यादातर नवनिर्वाचित पार्षद भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए। जिसके कारण जनता खासी नाराज भी थी। ऊपर से निगम के 12 पार्षदों को टिकट भी दे दिया। जिन में से एक भी नही जीत पाया। टिकट वितरण करते समय जमीनी हकीकत की अनदेखी की गई। इस कारण भाजपा को अपने भीतरघातियों का भी शिकार होना पड़ा। दरअसल भाजपा के जिन घमंडी नेताओं के हाथ में कमान सौंपी गईं, उन्होंने कार्यकर्ताओं से कोई संवाद नही रखा। प्रदेश अध्यक्ष, संगठन मंत्री, प्रभारी, चुनाव समिति के अध्यक्ष सब चाटुकारों से घिरे रहे और अपनी अपनी दुकानें चलाने में व्यस्त रहे। ग्राउंड लेवल पर जिन लोगों का ग्राफ कमजोर था, पार्टी ने उन नकली नेताओं पर ही ज्यादा भरोसा किया।

पुराने मंझे हुए कार्यकर्ताओं और नेताओं को दरकिनार किया गया। प्रो ओपी कोहली, डॉ नंद किशोर गर्ग, प्रो पीके चांदला, रामभज, पवन शर्मा जैसे नेता घर बैठ गए। इसलिए केंद्रीय नेताओं की फौज भी वोटरों के बीच पैठ नही बना पाई।

भाजपा अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर दिल्ली का चुनाव लड़ना चाहती थी, जो दिल्ली की जनता को समझ नहीं आया। पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी सामने नहीं किया। बावजूद इसके जितनी सीटें पार्टी ने जीती हैं, उससे ज्यादा नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मान कर चल रहे थे।
नकारात्मक प्रचार में लगे स्थानीय नेता मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में पूरी तरह विफल रहे। कच्ची कॉलोनियों को पक्का करने जैसे अहम मुद्दे को भाजपा सही से भुना नही पाई। जबकि इन्हीं कॉलोनियों में से अधिकांश में आम आदमी पार्टी मजबूत होकर उभरी है।

प्रदेश भाजपा के नेता भले ही मत प्रतिशत बढ़ने की बात कह कर खुद को को सांत्वना देने का प्रयास करें लेकिन यह कबूतर की भांति बिल्ली को देख कर आंख बंद कर लेने जैसा होगा। थोड़ा बहुत बढ़ा हुआ यह मत प्रतिशत अमित शाह की मेहनत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को पसंद करने वाले लोगों की बदौलत हुआ है। अन्यथा पार्टी की इससे भी ज्यादा बुरी दशा होती। कुल मिलाकर बीजेपी के कार्यकर्ताओं को छब्बीस साल का वनवास झेलने को मजबूर वाले नेताओं पर एक सर्जिकल स्ट्राइक की दरकार है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं दिल्ली मामलों के जानकार हैं)